Sunday, July 26, 2026

दिल की दुनिया और अजीत जोगी की प्रेम कहानी

दिल की दुनिया और अजीत जोगी...
नी भुलाइस दाई ददा ला

दिल की दुनिया शेरो शायरी और युवा उम्र की खास पहचान है. इसमें कहीं नहीं लगता कि दिल खून पंप करनेवाले शरीर का अंग है. दिल अर्थात रोमांस, श्रृंगार, शेरो शायरी नायक-नायिका का संग, गुदगुदी, उमंग ... और भी कुछ!
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1967 का वर्ष
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दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में एंजिओ रोड के ग्रूट शूर अस्पताल में लुई वाशकंस्की  भर्ती थे. पेशे  से किराना व्यापारी. मधुमेह (डायबिटीज) के रोगी और दिल (हार्ट) की समस्या. बहुत कम समय बचा था. केप टाउन ही में सड़क पार करते हुए 25 वर्षीया युवती डानिश डावाल और उसकी माँ को कार से टक्कर लगी. माँ तुरंत मर गई और डेनिस डावाल को डॉक्टर ने ब्रेन डेड घोषित कर दिया. डावाल के पिता ने तय किया कि बेटी का दिल और किडनी दान कर दिया जाए. डॉक्टर क्रिश्चियन बर्नार्ड ने मरीज लुई वाशकंस्की से पूछा कि क्या उसे युवती का दिल लगा दिया जाए? मरीज के दिल में कुछ गुदगुदी हुई. वह बहादुरी और जोश के साथ तैयार हुआ. दोनों ही श्वेत थे. ऑपरेशन सफल हुआ. दिल निकालकर उन्हें लगा दिया गया. वे ठीक हो गये. दिल काम कर रहा था. धड़कन जारी थी, किन्तु एक नई समस्या आई. न्यूमोनिया हुआ और ऑपरेशन के 18 दिन बाद उनकी की मृत्यु हो गई. 

ऐसा लगा, एक दिल ने दूसरे दिल को कबूल नहीं किया. रिश्ता टूट गया. यह दुनिया का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट था. इस डॉक्टर के नाम से कई रिकॉर्ड हैं.
युवती की किडनी दसवर्षीय अश्वेत बालक जोनाथन वैन वीक को लगा दी गई. यह ऑपरेशन भी सफल रहा. बालक छः वर्षों तक स्वस्थ जीवन जीता रहा.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली दिल की टूट-फूट और उसकी मरम्मती की लाक्षणिक प्रवृत्तियां भारतीय राजनीति में भी दिखने लगी थीं. 1967 के साल हुए चुनाव में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री तो बन गईं पर प्रांतों में कांग्रेस की दुर्बलता उजागर हो रही थी. सात-आठ प्रांतों में कांग्रेस विरोधी संविद सरकारें बनीं. हालांकि  ये सरकारें स्थिर नहीं थीं और इनमें सत्ता के लिए सिरफुटौवल तथा भीतरघात टापों टाप पर आ गया था. इसी तरह की टूट-फूट और उलट- पलट की प्रवृत्ति कथानायक अजीत जोगी के जीवन में भी शुरू हो रही थी.
1967 ही में अजीत जोगी ने भोपाल के मौलाना आजाद कॉलेज आफ टेक्नोलॉजी से मैकेनिकल ब्रांच में इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की. इसी समय दिग्विजय सिंह ने इंदौर से मैकेनिकल ब्रांच में इंजीनियरिंग डिग्री प्राप्त की. अजीत जोगी के साथ विशेषता यह रही कि विक्रम विश्वविद्यालय में टॉप पोजीशन मिला. इस समय विक्रम विश्वविद्यालय में उज्जैन, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और विदिशा के इंजीनियरिंग कॉलेज शामिल थे. इस बड़ी सफलता को साझा करने के लिए अजीत जोगी तकनीकी शिक्षा के संचालक श्रीवास्तव जी के पास पहुंचे. उन्हें जोगी जी ने कॉलेज के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया हुआ था. श्रीवास्तव जी भी प्रसन्न हुए. उन्हें मालूम था कि जोगी संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में बैठना चाहते हैं. उन्होंने जोगी जी से कहा कि प्रदेश के जिस भी इंजीनियरिंग कॉलेज में चाहते हो, लेक्चरर की नियुक्ति दे देता हूं. एक- दो पीरियड पढ़ाना और बाकी समय आईएएस की तैयारी करना. जोगी के गांव का सबसे नजदीकी कॉलेज रायपुर में था. वहां उनके बड़े भाई एस आर जोगी शासकीय विज्ञान महाविद्यालय में केमिस्ट्री के प्रोफेसर थे. चौबे कॉलोनी में उन्होंने सड़क के किनारे किराए पर एक छोटा-सा घर लिया था. मकान इंजीनियरिंग कॉलेज में कार्यरत मार्टिन जी का था. जोगी जी भाई के साथ रुके. घर के अंदर पानी का इंतजाम नहीं था. काम करने के लिए सहायिका थी. वह घर के काम के लिए पानी बाहर से बाल्टी में भरकर घर में लाया करती.

आज भी होता है कि काम करने वाली अचानक छुट्टी मार देती है. जोगी जी के आने के पहले ऐसा होने पर उनकी भाभी नल से पानी लाती थी. जब जोगी जी आए तो उन्होंने कहा कि भाभी आपका बाहर पानी लाने जाना अच्छा नहीं लगता. मैं पानी भर दिया करूंगा. मुझे आदत है. पेंड्रा में अपने शिक्षक गिरिजा शंकर तिवारी के घर भी इसी तरह बाल्टी से पानी भर दिया करता था. 

 गर्मी की छुट्टी में भाई सपरिवार गाँव चले गये. रायपुर में जोगी जी का कोई मित्र तो था नहीं. पढ़ने का खूब मौका मिला. पहले पांच विषयों को, जिनके अंक आईपीएस के लिए जोड़े जाने थे, उन्होंने कम-से-कम बीस बार रिवाइज किया.
अक्टूबर महीने में परीक्षा के लिए भोपाल मेडिकल कॉलेज के केंद्र  पहुंचे. रुकने का इंतजाम अपने पुराने हॉस्टल में किया था. पूरे मध्य प्रदेश में परीक्षा का एक ही केंद्र था. पचीस से तीस छात्र थे. धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होती गई और आखिर तक दस-बारह ही बचे. परीक्षा में जोगी जी पास हो गए. दिल्ली से इंटरव्यू देकर लौटे. गाँव में आम के बगीचे में बैठे आम चूस रहे थे तभी जोगी जी ने देखा कि भाई, पिता, घर के अन्य सदस्य और उनके मित्र अरुण तथा ननकी चले आ रहे हैं. आते ही उन्होंने अजीत को गोद में उठा लिया. उनके हाथ में टेलीग्राम था. आईपीएस में चयन होने की खबर थी. बड़े भाई ने मिठाई बंटवाई. बधाई देनेवाले आने लगे. शाम को अरुण साइमन के साथ घूमने निकले. ननकी भी साथ ही था. ननकी स्टेशन पर तांगे चलाने का काम करता था. बाद के दिनों में तांगा और घोड़े का साथ छूट गया तो कुली का काम करने लगा था. अरुण अपनी खेतीबारी के काम में लग गये थे पर समझ रहे थे कि आईपीएस का कितना बड़ा रुतबा होता है. 

अरुण ने ननकी से बात करते हुए कहा कि हम ठीक से पढ़ नहीं पाए पर 'दोस्त' को देखो. यहां का लोकप्रिय खेल हाकी और फुटबॉल था, लेकिन हमलोग क्रिकेट भी खेलने जाते थे. अजीत कभी बॉलिंग नहीं करता था. फील्डिंग भी बाउंड्री लाइन पर करता था. वहां खेल का इंवॉल्वमेंट कम होता था. इसका लाभ लेता था यह. बाउंड्री लाइन पर रखी अपनी किताब और कॉपी को देखकर रिवाइज करने में. अरुण को तब समझ में नहीं आता था कि इस तरह पढ़ने से कुछ लाभ भी हो सकता है. जो हुआ सो हुआ, लेकिन अजीत आईपीएस बनकर भी नहीं बदला. तीनों मित्र घूमते-बतियाते हुए वापस आ रहे थे. उनके रास्ते में राइस मिल था. मिल में पूजा हुई थी और प्रसाद बंट रहा था.

तीनों मित्र मिल में दाखिल हुए. लोग लाइन में लगकर प्रसाद ले रहे थे और चटाई पर बैठकर खा रहे थे. लाइन में लगते-लगते अरुण गर्व भरी हुंकार में बोला 'अरे, तुमलोग समझते क्यों नहीं, अजीत अब कप्तान साहब (सुपरिंटेंडेंट आफ पुलिस) बन गया है !'
पर वहां खड़े लोग और मिल के कर्मचारी ना कप्तान साहब समझे और ना सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस! तीनों मित्र प्रसाद लेकर चटाई पर बैठ खाने लगे. अरुण को लगा कि अजीत वैसा का वैसा ही है, कोई अहंकार या सुपिरिऑरिटी काम्प्लेक्स जैसी बात नहीं है.

सिलेक्शन टेलीग्राम के बाद मसूरी नेशनल एकेडमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन से पत्र आया, जिसमें कब और कैसे आने का विवरण था. इसके साथ, ले जानेवाले सामानों की लंबी सूची भी थी. इस सूची में बंद गले का कोट, गर्म पोशाक तथा अन्य वस्तुओं के नाम शामिल थे. घर में पैसे की तंगी थी, लेकिन पिता काशी जोगी ने सारा सामान जमा किया. अजीत के पिता अत्यंत ही परिश्रमी व्यक्ति थे. उनके दादा जीवन के संकट में ईसाई बने थे. काशी जोगी मिशन स्कूल में सपत्नीक टीचर थे. वे स्कूल आवर के बाद जंगल चले जाते. लगातार पेड़ काटते रहते और जमीन को खेती लायक बनाते. इस तरह उन्होंने पचीस-तीस एकड़ अलग से अपना खेत बना लिया था. काशी जोगी उस क्षेत्र के बड़े शिकारी थे.
वे आदमखोर बाघ भी मार रखे थे. इन शिकार अभियानों में अरुण साइमन के पिता भी उनके साथ कई बार जाते थे.  वह अंग्रेजी भी बेधड़क बोलते थे. मिशन में आने वाले अमेरिकन टूरिस्ट को शिकार और पर्यटन के लिए ले जानेवाली टीम में उन्हें शामिल किया जाता था. जबलपुर के बड़े वकील राजेंद्र सिंह पेंड्रा आए थे. काशी जोगी उनकी शिकार टीम में भी शामिल किये गये थे. कुल मिलाकर, काशी जोगी का इतना बड़ा नाम था कि पेंड्रा के जमींदार साहब ने उनकी बनाई कटेल जमीन पर उनका स्वामित्व मान लिया. राजस्व की भाषा में इसे नौतोड़ जमीन कहते हैं. परिश्रमी पिता ने आईपीएस पुत्र को सूची के अनुसार सामान जमा कर दिया. तब उनके घर में सूटकेस का चलन नहीं था. टिन के बड़े ट्रंक में सामान भरकर हमारे होनेवाले एसपी साहब पेंड्रा से मसूरी के लिए चल पड़े।

दिल्ली पहुंचने के बाद मसूरी के लिए दून एक्सप्रेस में सवार हुए. इस ट्रेन में अन्य प्रशिक्षु भी चढ़े. सुटेड-बुटेड और सिगरेट पीने वाले. वे सब आपस में बातें करते जाते. अजीत संकोच में रहे. मसूरी आने पर बाकी लोग टैक्सी से एकेडमी गए. अजीत बस से. चार महीने का फाउंडेशन कोर्स आईएएस-आईपीएस का साथ होता था, उसके बाद आईपीएस वाले अपनी ट्रेनिंग के लिए माउंट आबू चले जाते थे. इन चार महीनों में अजीत को मालूम हुआ कि आईएएस वाले आईपीएस वालों को अपने से हीन समझते हैं. सच्चाई भी यही थी. आईपीएस की वार्षिक चरित्रावली जिले का कलेक्टर लिखता था, भले ही दोनों एक ही बैच के हों. चरित्रावली लिखने का अर्थ था कि आईएएस अपनी पसंद नापसंद से उसका भविष्य बना- बिगाड़ सकता था. इस तरह से प्रशासन में आईएएस की सिनिऑरिटी स्थापित हो जाती थी. अजीत ने फिर से परीक्षा में बैठना तय किया. माता-पिता और भाई को भी बता दिया.

चार महीने बाद फाउंडेशन कोर्स पूरा हुआ तो पुलिस ट्रेनिंग के लिए माउंट आबू के प्रशिक्षण केंद्र भेजा गया. इनके बैच में 70 आईपीएस अधिकारी थे. अमूल डेयरी आनंद गुजरात में कार्यरत बड़े भाई भी मिलने आए. दो-तीन दिन तक रहे. ट्रेनिंग भी देखा और शहर भी. ट्रेनिंग के दौरान अजीत घर नहीं जा पाए थे. उन्होंने पिता से अनुरोध किया कि वे मिलने के लिए माउंट आबू आ जाएं. पिता ने अनुरोध स्वीकार कर लिया और माउंट आबू आए. पिता-पुत्र दोनों ने खुशी-खुशी समय बिताया. यह बहुत अच्छा इसलिए भी हुआ कि पिता बेटे को एसपी या कलेक्टर के रूप में जिले में देखना चाहते थे. कलेक्टर के रूप में वे पुत्र को काम करते नहीं देख पाए, क्योंकि 1973 में सीधी जिले में कलेक्टर के तौर पर अजीत की पोस्टिंग होने के पहले ही उनकी दुखद मृत्यु हो गई.

माउंट आबू में पुलिस प्रशिक्षण बड़ा  ही थकाउ था. अजीत जी और उनके तीन आईपीएस मित्रों ने आईएएस के लिए फॉर्म भर दिया था, पर पढ़ने का समय नहीं मिलता था. अकादमी में कानून की कक्षाएं उन्हें विशेष रूप से उपयोगी लगतीं क्योंकि उन्होंने मुख्य परीक्षा के लिए कानून को भी अपने आठ विषयों में शामिल किया था. सुबह सवेरे पढ़ने और रिवाइज करने की आदत उपयोगी रही. लंच ब्रेक में भी वह रिवाइज करने का काम करते रहते थे जैसा वह क्रिकेट खेलते हुए बाउंड्री पर फील्डिंग के दौरान करते थे. माउंट आबू से अहमदाबाद नजदीक था, इसलिए इन चारों ने अहमदाबाद को परीक्षा केंद्र के रूप में चुना था. परीक्षा के पहले अहमदाबाद में कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी तो कर्फ्यू लगा दिया गया. अहमदाबाद केंद्र के परीक्षार्थियों को सुविधा दी गई कि वे अपनी पसंद के केंद्र पर परीक्षा में शामिल हो सकते हैं. चारों मित्रों ने फैसला किया कि माउंट आबू से जयपुर केंद्र पर जाकर परीक्षा देंगे. परीक्षा खत्म होने पर वापस माउंट आबू लौटे. अकादमी की ट्रेनिंग खत्म होने पर फील्ड ट्रेनिंग के लिये इंदौर की पोस्टिंग  मिली. यह ट्रेनिंग कुछ ही महीने करनी पड़ी क्योंकि रिजल्ट आ गया. अजीत को जनरल केटेगरी से ऑल इंडिया में आठवां तथा मध्यप्रदेश में पहला स्थान प्राप्त हुआ था.

तब के समय भी परीक्षार्थियों से यूपीएससी की विभिन्न सेवाओं के लिए वरीयता मांगी जाती थी. इंटरव्यू के पहले उन्होंने तात्कालिक तौर पर किसी विचार से प्रेरित होकर इंडियन फॉरेन सर्विस को अपनी वरीयता में प्रथम स्थान पर रखा था. इंदौर में फील्ड ट्रेनिंग ले रहे थे तभी रिजल्ट निकलने पर उनके एसपी और कलेक्टर साहब ने कहा कि तुम्हारा पहला स्थान है मध्य प्रदेश में तो तुमको मध्य प्रदेश का राज्य ही आवंटित होगा. यहीं रहकर अपने लोगों की सेवा कर पाओगे. फॉरेन सर्विस में राजदूत बनने का मौका बुढ़ापे में मिलेगा. तबतक कई वर्ष तक विदेशी राजनयिकों तथा उनकी पत्नी के लिए कार का दरवाजा खोलते रहोगे. उस समय यूपीएससी सेवा संबंधी प्राथमिकता बदलने के लिए एक सप्ताह का समय देती थी. इस आशय का टेलीग्राम आया तो उनके एसपी नटराजन साहब ने भी ऐसा ही समझाया. नतीजा यह रहा कि एसपी साहब के आवास से ही प्राथमिकता बदलकर आईएएस करने के लिए यूपीएससी को टेलीग्राम कर दिया गया.

मंजिल मिल चुकी थी. अखबारों में फोटो और जीवन-परिचय छप रहा था. जोगी जी को दूसरी बार प्रशिक्षण के लिए जल्दी ही जाना था इसलिए वे छुट्टी लेकर माता-पिता-परिवार-संगी से मिलने गाँव वापस आ गए. गाँव से वापस अपने बड़े भाई के पास रायपुर आए. रायपुर के प्रसिद्ध कलेक्टर बी एस त्रिपाठी को मालूम हुआ कि मध्य प्रदेश का आईएएस टॉपर रायपुर में है तो उन्होंने चाय पर बुलवाया. कलेक्टर बंगले पर भेंट सुखद रही. त्रिपाठी जी ने बताया कि जितना श्रम और त्याग करना था कर चुके. अब उस मुकाम पर पहुंच चुके हो कि बाकी जिंदगी आराम से बिता सकते हो. अनुभवी बाबुओं और अधिकारियों द्वारा लिखित टीप में से 99% बिना पढ़े ही अनुमोदित कर सकते हैं. केवल एक प्रतिशत में ही अपना दिमाग लगाना पड़ेगा. 

जल्दी ही मसूरी से प्रशिक्षण का निर्देश मिला. मसूरी एकेडमी अभी स्मृति से गायब नहीं हुआ था. पूरी तरह फ्रेश था. बड़ी हंसी-खुशी दिल्ली तक की यात्रा तय की. दिल्ली से देहरादून ट्रेन में बहुत से प्रशिक्षण वाले बैठे. बहुत जल्द सफर के दौरान ही अजीत बाकी से घुल-मिल गए. ट्रंक वाला अजीत पीछे छूट चुका था. अकादमी का एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर गत वर्ष वाला ही था. उनसे अनुरोध कर हैप्पी हॉस्टल में अपना मनपसंद कमरा लिया. 
अकादमी में 300 से अधिक प्रशिक्षु थे. प्रेसिडेंट का चुनाव होना था. अजीत के पक्ष में कई चीजें थीं. आईपीएस वाले, आईएएस वाले, हिंदी वाले तथा ईसाई और अल्पसंख्यक वाले उनके पक्ष में हो गए. आज जैसे पंचायत चुनाव में शराब पिलाई जाती है, वैसा ही किया गया. एससी और एसटी वर्ग के प्रशिक्षुओं को अजीत ने कहा कि प्रेसिडेंट को हमारे वर्ग का होना चाहिए. वे भी सहमत हो गये. चुनाव का नतीजा निकला तो 300 में से अजीत को 200 मत मिले थे. प्रेसिडेंट के रूप में प्रथम कार्यकाल इतना सफल रहा कि दूसरे कार्यकाल का भी मौका मिला. 
अकादमी में घुड़सवारी की व्यवस्था थी. ग्रामीण पृष्ठभूमि वालों के लिए घुड़सवारी और घुड़दौड़ अतिरिक्त आनंद की चीज है. शहरी पृष्ठभूमि वालों के लिए आमतौर पर यह थकाऊ होती है और उनकी रुचि कम होती है. अपनी और अन्य कई की निगाह में अजीत अकादमी के बेस्ट घुड़सवार थे. इसी तरह फुटबॉल का खेल तो बचपन ही से मजेदार था. अजीत दूसरों को छकाते हुए गोल कर देने में कामयाब होते. प्रेसिडेंट का दूसरा टर्म उन्हें निर्विरोध मिला था . इन सब बातों से अजीत के व्यक्तित्व में निखार और आकर्षण आ गया था.

अभी तक अजीत कुछ बनने के लिए संघर्षरत थे. आईएएस बनने के बाद मसूरी अकादमी में दोबारा प्रेसिडेंट बन चुके थे. घुड़सवारी में प्रवीण हो चुके थे. ऐसा समझें कि जो बनना था, बन चुके थे. निगाहें उम्र के अनुसार महिला साथियों की तरफ गईं. 300 प्रशिक्षण वालों में लगभग 10% महिलाएं थी. सबकी सब सुंदर लगतीं. इनमें से दो महिला प्रशिक्षु आर्मी परिवार से थी. कुमारी सेस पूरे बैच में सर्वाधिक सुंदर और आकर्षक लगती. चाहत भी अक्सर संक्रामक हुआ करती है. कुमारी सेस को भी अजीत अच्छे लगने लगे. दोनों तरफ चाहत बनी तो कदम आगे बढ़े. सवेरे सवेरे अजीत स्नेह और लगाव से भरे पत्र कुमारी सेस के पास अपने सेवक के हाथ से भेजते. पत्र ससम्मान कबूल होता और यदाकदा उधर से जवाब भी आता. एक तो प्रेम ऐसे ही कवि बना देता है और अजीत के लिए यह सिचुएशन कंफर्टेबल इसलिए भी था क्योंकि भोपाल में वे कॉलेज के दिनों में उर्दू शायरी के शौकीन रह चुके थे. शायरी भी क्या गजब की चीज होती है ऐसे मामलों में.

कुमारी सेस के पहले पिता आर्मी वाले थे. वे शहीद हो चुके थे. इसके बाद सेस की मां ने आर्मी ही के अधिकारी से विवाह कर लिया था. सेस की बड़ी बहन के पति वायु सेवा में अधिकारी थे. सेस का पूरा परिवार मसूरी दो बार आया. कैंपस में रुका. पूरा परिवार समझना चाह रहा था कि क्या अजीत और सेस की निभ पाएगी. क्या अजीत उतना ही अच्छा है जितना सेस बताती है ? अजीत ने अपनी तरफ से पूरा स्वागत-सत्कार तथा मनोरंजन का इंतजाम रखा. सेस के परिवार ने अजीत को स्वीकार कर लिया. अकादमी में भी खबर आम हो गई कि दोनों विवाह करेंगे. अजीत ने अपने परिवार में भी सेस और उसके परिवार के आने की चर्चा की. अजीत के परिवार ने इस संबंध को बहुत तवज्जो नहीं दी. न तो हां कहा और न मना ही किया. अच्छे दिन आ गए थे और चलते ही जा रहे थे पर ट्रेनिंग को तो समाप्त होना था. हुआ भी.

सेस का परिवार पंजाब-हरियाणा के सीमावर्ती क्षेत्र का था, लेकिन दिल्ली में भी उनका अपना बड़ा घर था. सेस अपने दिल्ली वाले घर आ गई. 

अजीत को अपनी पोस्टिंग पर वापस जबलपुर जाना था. अपने शासकीय अवकाश का उपयोग करते हुए वे दिल्ली के मध्यप्रदेश भवन में रुक गए. रोजाना दोनों अच्छे रेस्टोरेंट में भोजन के लिए जाते. सेस की कनॉट प्लेस वाले हनुमान जी में बड़ी श्रद्धा थी. यह मंदिर अति प्राचीन माना जाता है. महाभारत काल में निर्मित हुआ था, ऐसी परंपरा है. कभी-कभी सेस, अजीत को भी अपने साथ पूजा करने ले जाती. छुट्टी समाप्त होने पर अजीत जबलपुर आ गए. उन्हें एसडीएम सिहोरा और कटनी का प्रभार मिला. इसके बाद जबलपुर में एडिशनल कलेक्टर बनाए गए. इसी समय अजीत के पिता श्री काशी प्रकाश जोगी की मृत्यु हो गई. 

पिता गुजर गए. अजीत को पिता की याद, उनके संघर्ष की कुव्वत के कारण तो थी ही, कम से कम एक घटना ने उन्हें पिता से घनिष्ठ कर दिया था. अजीत की बड़ी बहन ने पीढ़े के पास बर्तन में गर्म पानी रखा था. कुछ खाने के लिए बालक अजीत वहां पहुंचे और धोखे में गर्म पानी पर बैठ गए. पीछे का भाग बुरी तरह से जल गया. अमेरिकन डॉक्टर बानम ने दवा देने के साथ उल्टा सोने के लिए कहा. पिताजी अजीत को गोद में उल्टा लिटा कर रात भर सुलाते. नींद खुलती तो अजीत अपने आप को पिता की गोद में पाते और फिर चैन से सो जाते. इसके बाद छाया की तरह पिता के साथ रहने लगे. पिता के साथ रहने से उन्होंने नागर चलाना, रोपा लगाना, धान की कटाई करना और बोझा लेकर बैलगाड़ी तक पहुंचाने और मिजाई में शामिल होने का काम किया. आमतौर पर पिता 16-17 घंटे काम करते थे. ऐसे पिता गुजरे थे. सदमा लगा.

थोड़े दिनों के लिए अजीत की पदस्थापना जबलपुर से ग्वालियर कर दी गई. ग्वालियर में उनके जीवन के महत्त्वपूर्ण पड़ाव की शुरुआत हुई. श्रीमंत माधवराव सिंधिया से सीधा संपर्क स्थापित हुआ. संपर्क बनने में दूसरे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति भास्कर समूह के संस्थापक श्री रमेश चंद्र अग्रवाल थे. ग्वालियर रहने का एक लाभ यह भी होता था कि अजीत जोगी साहब, कुमारी सेस से मिलने दिल्ली चले जाया करते थे. अच्छे दिन चल रहे थे पर बहुत दिन नहीं चल सकते थे. 

पिता की मृत्यु के बाद माँ ही घर की प्रमुख थी. मां ने अपने जीवनसाथी का अच्छा साथ दिया था. दोनों मिशन स्कूल में शिक्षक थे. खेती-बाड़ी भी बढ़ी थी. इस दंपति की आठ संतान थी. चार पुत्र और चार पुत्री. टैगोर, सुभाष और रजनीश के भाई-बहनों की संख्या दस से अधिक थी. इस बड़ी संख्या का एक लाभ यह होता था कि किसी एक बच्चे को अतिरिक्त लाड़-प्यार नहीं मिलता था. लाड़-प्यार के कारण बच्चों के बिगड़ने की संभावना नहीं रहती थी. सारी बड़ी सफलताओं के बाद भी परिवार में सुभाष को अतिरिक्त महत्त्व नहीं मिला. सुभाष भी घोषित तौर पर एमिली से विवाह नहीं कर पाए थे. 

अजीत ने माताजी को साफ-साफ कहा कि वह कुमारी सेस से शादी करना चाहते हैं. सेस के बिना उनका जीवन अधूरा है. वे विवाह के लिए वादा कर चुके हैं. 

माँ का कहना था कि हम गांव के साधारण लोग हैं. उस तरह के हाई-फाई परिवार के साथ मिक्स नहीं कर पाएंगे. विवाह तो परिवार के स्तर पर होता है. मुन्ना को अपना विवाह स्वर्गीय पिता की इच्छा के अनुसार अपने समाज के अंदर करना चाहिए. ऐसी लड़की हो जो परिवार में फिट हो सके.

अजीत को याद आया कि हाई स्कूल के हेड मास्टर कुरचनिया साहब  जबलपुर के रहने वाले थे. लोकतंत्र तथा संसदीय व्यवस्था को छात्रों के बीच समझाने के लिए उन्होंने छात्र संसद का आयोजन किया था. स्कूल के सारे छात्र सांसद के रूप में बैठे थे. छात्र सत्ता-पक्ष और विपक्ष की भूमिका निभा रहे थे. बाद के दिनों में मध्य प्रदेश में मंत्री बनने वाले आदिवासी नेता भंवर सिंह पोर्ते  भी शामिल थे. अजीत ने बहुत अच्छे से इस छात्र-संसद को संचालित किया था. केवल यादें ही शेष थीं. अभी तो कलेक्टर बनने पर भी वह अपने मन से विवाह करने का कार्यक्रम संचालित नहीं कर पा रहे थे. 

माँ बड़ी बाधा बनी खड़ी थी. अंतिम तौर पर उन्होंने माँ को समझाया कि आप दिल्ली चलकर एक बार मिल तो लो. उसके बाद फैसला करना. माँ बहुत नाराज हुई. रूठ गई और घर में बंद हो गई. बाहर नहीं निकली. अजीत इंतजार कर रहे थे कि शायद समय के साथ मान जाएगी मां. 

आमतौर पर कन्या पक्ष वालों को विवाह की जल्दी रहती है. कुमारी सेस और उसके परिवार को भी थी. देर होने से सेस को लगा कि अजीत विवाह नहीं करना चाहते हैं शायद.  

दिल्ली गए थे सेस से मिलने अजीत. उनसे इस बाबत पूछा गया. अजीत ने माँ का प्रसंग भारी मन से सुनाया. अजीत, सेस और सेस के परिवार को लगा कि माँ का मन नहीं तोड़ा जाना चाहिए. दोनों पक्षों ने भारी मन से एक-दूसरे को छूट दे दी. माँ के दुख पर प्रेम-संबंध, विवाह-वेदी की परिणति तक पहुंचाना उचित नहीं लगा दोनों को. दोनों ने अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता के बूते माँ को अनदेखा नहीं किया. अजीत ने कहा कि सेस तुम अपनी मर्जी से कहीं और विवाह कर लो. मैं तुम्हारी शादी का इंतजार करूंगा. शुरू वाली पंक्ति की स्थिति फिर से आ गई. दिल ने दिल को कबूल नहीं किया. दोनों दिल नहीं मिल पाए. 

जल्दी ही सेस की मित्रता समृद्ध जाट सिख परिवार के जेस से हो गई. नाम भी मिलता था जेस और सेस. विवाह पूर्ण हो गया. उनका जीवन रास्ते पर आ गया.

अजीत को प्राथमिकता देते हुए दो वरीय को छोड़ मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी ने सीधी जिले के कलेक्टर के तौर पर पोस्टिंग दे दी. परिवार और प्रेम से बिछड़े अजीत ने क्षेत्र का सघन दौरा करना शुरू किया. कार्य क्षमता की धूम मचने लगी. जीप में खाना बनाने का रसद रखा होता. कभी रेस्ट हाउस तो कभी पंचायत भवन तो कभी स्कूल में रात का डेरा जमता. ड्राइवर दुबरी सिंह चौकीदार के साथ मिलकर खाना बनाते. 
एक नई चीज हुई इन दिनों. मसूरी में अजीत घुड़सवारी पसंद करते थे. सीधी में जीप चलाना पसंद करने लगे. वह भी काफी तेज. एक दौरे में मंत्री और सीधी के नेता कुंवर अर्जुन सिंह बैठे थे साथ में. अनायास एक जगह उन्होंने गाड़ी रोकने कहा. अजीत ने गाड़ी रोकी तो कुंवर साहब गाड़ी से उतर गए और बोले कि यदि आप गाड़ी इसी तरह चलाएंगे तो मैं नहीं जाऊंगा. अजीत शर्मा गये. आश्वस्त किया कि ठीक से चलूंगा....ठीक से चलूंगा.

जीप ठीक से चली.
कंट्रोल हो गया.
इसके बाद श्री अजीत जोगी ने 
माँ की पसंद से 
डॉक्टर रेनू सोलोमन से 
विवाह की सहमति दे दी.
माँ का लाडला
कंट्रोल हो गया!