Sunday, July 31, 2011

नीतीश जी का बिहार

घर जाते हुए लगा कि बिहार बदल रहा है. पटना आने के पहले सुना था कि गांधी सेतु पर मरम्मत चल रहा है और इस कारण से मुजफ्फरपुर जाने वाली सड़क पर जाम लगा करता है. कभी कभी तो पन्द्रह से बीस किलोमीटर लंबी कतार वाली कुख्यात जाम

पटना के बस स्टैंड से निकलते ही जाम से सामना हुआ. पटना बाई पास से निकलने में ही एक घंटा लग गया, पहले की तुलना में एक नया परिवर्तन पाया. गाड़ी वाले जगह मिलने पर भी लाईन तोड़ कर ओवरटेक करने को तैयार नहीं थे. देर होने के बाद भी आपा धापी नहीं मची थी. कंडक्टर ने बताया कि नीतीश जी ने धक्का मुक्की रोकने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था कर दी है. दो हजार रुपयों का जुरमाना तुरत जमा करना पड़ता है. बोलेरों वालों को भी ऐसा करने पर जुरमाना भरना पड़ता है. हमारी गाड़ी अपनी कतार में ही बढ़ती रुकती रही. मालूम हुआ कि मोकामा वाले पुल पर रिपेयर हो रहा है सो गाँधी सेतु पर दबाव बढ़ गया है . गाँधी सेतु पर भी रिपेयर चल रहा है,कहीं पर पहली लेन में तो कहीं पर दूसरी लेन में. चार गाड़ियों के बदले दो ही गाडियां आ जा सकती हैं. यह था जाम लगने का राज.. मुजफ्फरपुर शहर की सीमा से बाहर निकलने पर मालूम हुआ कि पटना दरभंगा फ्लाई ओवर चालू हो गया है. पटना से सीतामढी तक रास्ते भर सड़क निर्माण का कार्य होता दिखा.. कंडक्टर ने बताया कि सारी सड़कें फोर लेन बनायी जा रही है. सीतामढी शहर में मेहसौल चौक के पास लखनदेई नदी पर बने पुल की मम्मत का काम चल रहा था सो वहाँ पर भी जेठ महीने की भरी दोपहरी में दुःख दायी जाम का सामना करना पड़ा. भूख भी जोरों से लगी थी. डायबिटीज का मरीज़ हो चुका हूँ. शुगर लो होने से गिरने का भी खतरा था. स्टैंड में और आस पास बारिश का पानी जमा था. मौका निकाल कर यात्री कहीं भी अपनी लघुशंका से निपट रहे थे. कहीं-कहीं दीर्घ वाले भी थे. हवा में दुर्गन्ध ठोस आकार में थी. खाने वाले होटल जलकुम्भी कि तरह थे - चारो तरफ गन्दा पानी पसरा हुआ था. मन में निश्चित था कि यहाँ भोजन करने के उपरांत डायरिया होना ही है. तय किया कि डीपेनडाल की गोली खा लूँगा लेकिन भोजन किया जाये. पन्द्रह रुपये में भर पेट भोजन किया. मेरे डर के बावजूद पूरे प्रवास के दौरान लूज़ मोशन, और गैस कि शिकायत नहीं हुई. लगता है कुपोषण और गंदगी के कारण बैक्टीरिया वायरस वगैरह विलोपित हो चुके थे

अनुज वकील साहब के डेरे पहुंचा. वहीं अखबार में पढ़ा कि सीतामढी के अन्दहरा गांव के एक छात्र कुंदन तथा खगौल की छात्रा शालिनी यादव ने संयुक्त रूप से बिहार बोर्ड में टाप किया है. नीतीश जी ने उसके घर जाकर बधाई दी है. दोनों को लैप टाप भी भेंट किया गया है. स्टेट बैंक ने पन्द्रह हजार की पुरस्कार राशि दी है. कुंदन ने लालटेन की रौशनी में पढाई की थी. वकील साहब के यहाँ घरेलू काम के लिए एक लड़की रहती थी. मालूम हुआ कि अपने घर लौट गयी है. उसे सरकार की तरफ से वजीफा मिल रहा है, रोज स्कूल जा रही है पढ़ने के लिए. कपडा भी दिया जा रहा है. खाना भी मिलता है. ऐसी अनेक राजू, गुड्डी और मुन्नी अपने मालिकों के घर से काम छोड़ कर लौट गयीं हैं. मालिकों के घरों में बच्चों को घरेलु काम खुद करने पड रहे हैं. धीमी गति से सामाजिक परिवर्तन जारी हैं. पंचायती चुनाव के आरक्षण ने इसी तरह से जनतंत्र के सामाजिक आधार का विस्तार किया है. इस सामाजिक विस्तार में सब कुछ सरल और सीधा नहीं है. खरसान के पूर्व मुखिया कुनकुन मांझी को डकैती का अभियुक्त बनाया गया है पकरी के साहू द्वारा दो दिन पहले. यह भी सुना कि कुनकुन ने साहू को दो लाख रुपये दिए थे चिमनी चलाने के लिए. रुपये तो वापस किये नहीं उलटे कुनकुन पर डकैती का अभियुक्त बना दिया

गांव में कुछ और भी परिवर्तन हुए हैं, पहले धान की खेती अधिक होती थी लेकिन आजकल गेहूं पर अधिक जोर है. मेरा गांव भारत की बड़ी समस्याओ से रूबरू हो चुका है. ललन ट्रक चलाने के पेशे में डाला गया था. कोलकाता के पास कहीं मरा तो बाक्स में डाल गांव तक लाया गया. लाश से बहुत बदबू आ रही थी. अर्थी पर ले जाना मुश्किल था. बाक्स में ही शमशान तक ले जाया गया. चिता बनाने के बाद अपनी नाक बाँध कर लोगों ने उसे बाक्स से चिता पर उलट कर अग्नि दी. दबे सुर में कहा गया कि हमारे गाँव में एड्स का पहला शिकार वही बना. दूसरा शिकार बनने वाला लड़का धर्मेन्द्र था. सीधा सादा लड़का था, इतना सीधा कि अपने भाई को अपनी एक आँख देने के लिए तैयार था. उसका भाई अपराधी वर्ग का था और एक कांड के दौरान बगल के गांव वालों ने उसकी आँखें फोड दी थीं. उसे कहीं जाना नहीं पड़ा कहा जाता है कि उसकी पत्नी को एड्स था. उसे तो घर बैठे ही मिल गया. कुछ दिनों बाद उसने निराशा और शर्मिंदगी से विष पान कर लिया

पटना में फेसबुकिया मित्र डॉ. राजू एवं मुसाफिर बैठा जी से मुलाकात तय थी. वर्चुअल रियलिटी से मुकाबला होना था. पर स्टेशन के बुद्ध प्लाज़ा में यह घटना मुकाबला की बजाये मन मिलन समारोह साबित हुआ. ढेर सारी बातें हुई. लगभग दो घंटे बाद उन दोनों को विदा किया. गाडी लगभग समय पर थी पर वापस होते हुए ट्रेन में पाया कि डेली पैसेंजर शेर हो चुके हैं. पहले तो ये लोग स्लीपर में ही घुसते थे. घुस्पैठियों में किशोर, युवक और वृद्ध तीनो थे. एक ने तो रामनामी चादर भी ओढ़ रखी थी. सोचा कि एक फोटो हो जाए पर लफड़े के डर से इरादा मुल्तवी किया.. रामनाम ने उन्हें इस काम से नहीं रोका था. रोकने का काम तो स्टेन गन धारी सिपाहियों और टी टी लोगों ने भी नहीं किया. मैंने बात की तो उन लोगों ने कहा कि बाढ = मोकामा तक तो ये जाते ही हैं, रोज रोज का तो काम है कौन उनके मुंह लगे ! इसी तरह की स्थिति रायगढ़ से दुर्ग और अलीगढ से दिल्ली के बीच बनी रहती है. मन को बताया कि केवल पटना के पास में रेल की धक्का मुक्की नहीं है. बिलासपुर पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगा कि नीतिश जी के बिहार में सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं. खामियां कहाँ नहीं होतीं. समयांतर जुलाई २०११ में विष्णु शर्मा जी ने पृष्ठ १७ पर लिखा है कि सी. बी. एस. . की परीक्षा में पास करने वालों का प्रतिशत ८१ प्रतिशत से ऊपर रहा. तमिलनाडू बोर्ड में ८५ से अधिक रहा. पिछले साल बिहार बोर्ड में पास होने वाले छात्रों का प्रतिशत ७०.१९ था. इस वर्ष यह घट कर ६७.२१ हो गया


डॉ राजू के अनुरोध पर अगली पोस्ट में सीतामढ़ी के दलित - मुसहर संत.

Tuesday, June 21, 2011

बाबू नवाब सिंह



नेपाल की सीमा पर उत्तरी बिहार के सीतामढी जिले में खरसान नाम से एक गांव है .गांव तो बड़ा ही प्रसिद्द है . इसकी ख्याति राजपुतान गांव के रूप में थी, वैसे दीगर जातियों के लोग भी थे . गांव के बगल में लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर आजादी के पहले सुगर फैक्ट्री खुली. बडी संख्या में राजपूत लड़के नौकरी पा गए. दीगर जात के लोग भी पाए. अधिकांश को सिपाही की नौकरी मिली और खरसान के राजपूतों ने अपने नाम पर बट्टा नहीं लगने दिया. इसका कारण था कि यहाँ के राजपूतों के एक हिस्से को संपत्ति की रक्षा के लिए ही बाहर से लाकर गांव में बसाया गया था . गांव के दबंग और अमीर लोग बैस राजपूत थे . इस शाखा में बाबू पहली सिंह बड़े ही विख्यात हुए .कहा जाता है कि सीतामढी से गंगा के पहलेजाघाट तक उनके नाम के ख्याति थी .

लगभग डेढ़ सौ साल पहले अन्ग्रेजी राज में कानून औ व्यवस्था की समस्या हुई तो इन अमीर और दबंग लोगों ने चार मजबूत और लाठी के धनी कुरुवंशी राजपूत भाइयों को आमंत्रित किया . चारों भाई वचन के धनी तो थे ही बलशाली पहलवान भी थे .आजीविका की तलाश में चारो भाई आये तो उनके साथ एक नाई और लुहारी का का करने वाला बढ़इ भी था . तीन भाईयों ने परिवार बसाया और चौथे ने धर्म कर्म में मन रमा लिया .सब के परिवार बढते गए पर इनके वंशजों में एका बना रहा . तीर्थ यात्रा के दौरान हज्जामों के पुरखे सुकेश्वर ठाकुर की मृत्यु हुई तो तीन भाइयों के वंश के प्रमुख उत्तराधिकारी श्री नवद सिंह ने स्वयं मृतक का अंतिम संस्कार किया .

कुरुवंशी राजपूतों को १८५७ के बाद अंग्रेजों द्वारा उत्पन्न क़ानून और व्यवस्था की गडबरी के कारण बुलाया गया था अतएव अंग्रेजीराज से सहानुभूति तो होनी नहीं थी लेकिन आजीविका के लिए १९२० के दशक में ब्रह्मदेव बाबू और विद्या बाबू के दादा जी श्री नवाब सिंह बिहार सरकार की जेल पुलिस में भर्ती हुए , रसान और निकटवर्ती ग्राम कुसुमारी के अनेक लोगों को अपने संपर्कों से नौकरी दिलायी . बाबू नवाब सिंह रुतबे वाले हो चले थे. उनकी आखिरी पदस्थापना भागलपुर जेल में हुई थी.

सविनय अवज्ञा आंदोलन के दिनों बिहार के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी भागलपुर जेल में बंद थे. इन नेताओं के लिए जेल से भागने की योजना बनाई गयी. नेताओं ने तय किया की जेल से भागने की इस गोपनीय तैयारी में बाबू नवाब सिंह की बड़ी भूमिका रहे. ज़ाहिर था कि जेल ब्रेक की घटना के आम होते ही नवाब सिंह पकड़ लिए जाते और उनकी नौकरी छूट जाती. इसकी क्षतिपूर्ति की व्यस्था निश्चित की गयी. इस सम्बन्ध में किया जा रहा पत्राचार गांव के एक ब्रिटिश भक्त के हाथ लग गया. सारी योजना का पर्दाफाश हो गया. नवाब सिंह नौकरी से निकाल दिए गए. बेरोजगारी में वापस गांव आ गए. पुत्र का भविष्य भी अनिश्चित रह गया. पिता-पुत्र दोनों सीमित पुश्तैनी भूमि पर कृषि करने लगे. उनके परिश्रम से उनके पोतों को सतत संघर्ष करने की प्रेरणा मिली. श्री ब्रह्मदेव सिंह वायुसेना के हवाई अड्डे में कार्यरत रहे तथा पूरी कार्यावधि के बाद सेवा से निवृत्त हुए. छोटे पोते श्री विद्या नंदन सिंह संस्कृत हाई स्कूल से रिटायर होने वाले हैं. विद्या सिंह के बालसखा श्री महेंद्र सिंह ने मुंबई के आर्थिक जगत में बिल्डर के रूप में सफलता प्राप्त की है तथा फिल्म निर्माण के व्यवसाय से भी जुड़े हैं.